Monday, October 19, 2026

बजरंगबली



नश्वर है संसार यहाँ पर इंसानों की कहाँ चली,
अपना कर्म करो बाकी सब देखेंगे बजरंगबली।

वनवासी थे राम कहाँ था उनके पास कोई साधन,
सोचो, क्या होता यदि उनको ना मिलते बजरंगबली।

कालनेमि त्रेता में भी थे और आज भी मिलते हैं,
पर उनको पहचान ठिकाने लाएंगे बजरंगबली।

हरा सिया का शोक अशोक तले उनको धीरज देकर,
धरो उन्हीं का ध्यान तुम्हें धीरज देंगे बजरंगबली।

रावण की प्रवृत्ति हर युग में कदम - कदम पर मिलती है,
बज्र मुष्टिका तान संभालेंगे सब कुछ बजरंगबली।

- ओमप्रकाश तिवारी

( दीपू के 30वें जन्मदिन 19 अक्टूबर, 2026 को सुबह पांच बजे )


Tuesday, July 15, 2025

चुप रहिए

ॐ 
....
किससे - किससे आप लड़ेंगे, चुप रहिए,
लड़कर कितना आप बढ़ेंगे, चुप रहिए।

अपनी नजरों में हर शख्स सही ही है,
किससे कितना आप अड़ेंगे, चुप रहिए।

चाह रहा हर व्यक्ति पढ़ाना पाठ नए,
आखिर कितना और पढ़ेंगे, चुप रहिए।

जितनी बहस करोगे तुम्हें डराएगा,
उससे कितना और डरेंगे, चुप रहिए।

दशा देश की देख दुखी क्यों होते हैं,
किया जिन्होंने वही भरेंगे, चुप रहिए।

- ओमप्रकाश तिवारी 
17 जून, 2025

Tuesday, February 15, 2022

शेष है

जा चुके हैं हम तली तक बस उछलना शेष है,
चीर कर इस भँवर को बाहर निकलना शेष है।

नाव थी कमजोर नाविक भी जरा मदहोश था,
अब तो लहरों की दिशा में बस फिसलना शेष है।

रेत पर तपती हुई था चला नंगे पाँव ही,
साँझ होने आ गई चंदा निकलना शेष है।

आपने जैसा कहा हम जाम भरते रह गए,
कह रहे हो अब कि अब भी बर्फ गलना शेष है।

जिस भरोसे पर चले वह तो न कायम रह सका,
मित्र बतला दो कि क्या कुछ और छलना शेष है !
- ओमप्रकाश तिवारी

Wednesday, February 15, 2017

असर देखो दुआओं

न मुँह देखो दवाओं का
असर देखो दुआओं का
कई कंधे हैं बाजू में
भरोसा है तो पावों का
बगल में मुस्कराते दोस्त
हरते दर्द घावों का
पता चलता इसी दौराँ
सभी रिश्तों के भावों का
सभी फिक्रों पे है भारी
सुखन आँचल के छावों का
- ओमप्रकाश तिवारी
( 15 फरवरी, 2016)

हम खड़े हो जाएंगे


तुम गिराओ, फिर गिराओ, हम खड़े हो जाएंगे।
शौक से काटो मियाँ हम फिर बड़े हो जाएंगे ।।

चिन्गियां लाओ हवा दो डाल कर घी रात भर,
किंतु हम मिश्री की डलियाँ बिन लड़े हो जाएंगे।

हम रुई हैं जब तलक तुम हो बताशे की तरह,
तुम हुए अखरोट तो हम भी कड़े हो जाएंगे ।

सोचते हैं वो जिन्हें हो फिक्र तनिक जमीर की,
आपका क्या, आप तो चिकने घड़े हो जाएंगे।

कर सकें तो कीजिए कुछ आप दुनिया के लिए,
वरना औरों की तरह मुर्दे गड़े हो जाएंगे ।

- ओमप्रकाश तिवारी
14 फरवरी, 2016
( मित्रो, बीमारी के बाद की यह पहली रचना आज सुबह ही बन पड़ी)

Friday, January 22, 2016

तू भले पच्चास है

हाल ही में मौत ने करवा दिया अहसास है,
पास में ही हूँ खड़ी मैं तू भले पच्चास है।

एक दर्जन ब्लॉक नस में और बीपी नभ चढ़ा,
रक्तकण के बीच देवी शर्करा का वास है।

आइसीयू की मशीनें औ दवाओं की महक,
श्वेतवसना मधुरभाषी नर्स ही बस पास है।

चुक गई आधी सदी औ हाथ में कुछ भी नहीं,
भीड़ में भी रिक्तता का हो रहा आभास है।

सोचता हूँ कुछ मगर होता यहाँ कुछ और है,
सच कहूँ इंसान केवल परिस्थिति का दास है।

- ओमप्रकाश तिवारी
सुबह 10.55
17 जनवरी, 2016 (रविवार)
आईसीयू - 1, बेड नं. 07,
हीरानंदानी अस्पताल, मुंबई।  

Thursday, November 5, 2015

मौन के हथियार से

जीतिए दिल दुश्मनों का आप अपने प्यार से,
बोलने वालों से लड़िए मौन के हथियार से।
हो जहाँ नाकाम लश्कर भी सिकंदर वीर का,
जंग जीती हैं गई इक तबस्सुम की मार से ।
पीढ़ियों से धधकती ज्वाला भी बुझती है मियाँ,
आपके मीठे वचन की एक मस्त फुहार से।
जंग जीतो इस तरह कि राज सबके दिल पे हो,
बच के रहना पर हमेशा निज नजर की हार से।
वायदों के जाल में मत फांसिए आवाम को,
उससे बेहतर छवि बनेगी आपके इंकार से।
बेहिचक लड़िए झगड़िए साधिए निज स्वार्थ भी,
दीजिए तरजीह पर कर्तव्य को अधिकार से।
- ओमप्रकाश तिवारी