Tuesday, July 15, 2025

चुप रहिए

ॐ 
....
किससे - किससे आप लड़ेंगे, चुप रहिए,
लड़कर कितना आप बढ़ेंगे, चुप रहिए।

अपनी नजरों में हर शख्स सही ही है,
किससे कितना आप अड़ेंगे, चुप रहिए।

चाह रहा हर व्यक्ति पढ़ाना पाठ नए,
आखिर कितना और पढ़ेंगे, चुप रहिए।

जितनी बहस करोगे तुम्हें डराएगा,
उससे कितना और डरेंगे, चुप रहिए।

दशा देश की देख दुखी क्यों होते हैं,
किया जिन्होंने वही भरेंगे, चुप रहिए।

- ओमप्रकाश तिवारी 
17 जून, 2025

Tuesday, February 15, 2022

शेष है

जा चुके हैं हम तली तक बस उछलना शेष है,
चीर कर इस भँवर को बाहर निकलना शेष है।

नाव थी कमजोर नाविक भी जरा मदहोश था,
अब तो लहरों की दिशा में बस फिसलना शेष है।

रेत पर तपती हुई था चला नंगे पाँव ही,
साँझ होने आ गई चंदा निकलना शेष है।

आपने जैसा कहा हम जाम भरते रह गए,
कह रहे हो अब कि अब भी बर्फ गलना शेष है।

जिस भरोसे पर चले वह तो न कायम रह सका,
मित्र बतला दो कि क्या कुछ और छलना शेष है !
- ओमप्रकाश तिवारी

Wednesday, February 15, 2017

असर देखो दुआओं

न मुँह देखो दवाओं का
असर देखो दुआओं का
कई कंधे हैं बाजू में
भरोसा है तो पावों का
बगल में मुस्कराते दोस्त
हरते दर्द घावों का
पता चलता इसी दौराँ
सभी रिश्तों के भावों का
सभी फिक्रों पे है भारी
सुखन आँचल के छावों का
- ओमप्रकाश तिवारी
( 15 फरवरी, 2016)

हम खड़े हो जाएंगे


तुम गिराओ, फिर गिराओ, हम खड़े हो जाएंगे।
शौक से काटो मियाँ हम फिर बड़े हो जाएंगे ।।

चिन्गियां लाओ हवा दो डाल कर घी रात भर,
किंतु हम मिश्री की डलियाँ बिन लड़े हो जाएंगे।

हम रुई हैं जब तलक तुम हो बताशे की तरह,
तुम हुए अखरोट तो हम भी कड़े हो जाएंगे ।

सोचते हैं वो जिन्हें हो फिक्र तनिक जमीर की,
आपका क्या, आप तो चिकने घड़े हो जाएंगे।

कर सकें तो कीजिए कुछ आप दुनिया के लिए,
वरना औरों की तरह मुर्दे गड़े हो जाएंगे ।

- ओमप्रकाश तिवारी
14 फरवरी, 2016
( मित्रो, बीमारी के बाद की यह पहली रचना आज सुबह ही बन पड़ी)

Friday, January 22, 2016

तू भले पच्चास है

हाल ही में मौत ने करवा दिया अहसास है,
पास में ही हूँ खड़ी मैं तू भले पच्चास है।

एक दर्जन ब्लॉक नस में और बीपी नभ चढ़ा,
रक्तकण के बीच देवी शर्करा का वास है।

आइसीयू की मशीनें औ दवाओं की महक,
श्वेतवसना मधुरभाषी नर्स ही बस पास है।

चुक गई आधी सदी औ हाथ में कुछ भी नहीं,
भीड़ में भी रिक्तता का हो रहा आभास है।

सोचता हूँ कुछ मगर होता यहाँ कुछ और है,
सच कहूँ इंसान केवल परिस्थिति का दास है।

- ओमप्रकाश तिवारी
सुबह 10.55
17 जनवरी, 2016 (रविवार)
आईसीयू - 1, बेड नं. 07,
हीरानंदानी अस्पताल, मुंबई।  

Thursday, November 5, 2015

मौन के हथियार से

जीतिए दिल दुश्मनों का आप अपने प्यार से,
बोलने वालों से लड़िए मौन के हथियार से।
हो जहाँ नाकाम लश्कर भी सिकंदर वीर का,
जंग जीती हैं गई इक तबस्सुम की मार से ।
पीढ़ियों से धधकती ज्वाला भी बुझती है मियाँ,
आपके मीठे वचन की एक मस्त फुहार से।
जंग जीतो इस तरह कि राज सबके दिल पे हो,
बच के रहना पर हमेशा निज नजर की हार से।
वायदों के जाल में मत फांसिए आवाम को,
उससे बेहतर छवि बनेगी आपके इंकार से।
बेहिचक लड़िए झगड़िए साधिए निज स्वार्थ भी,
दीजिए तरजीह पर कर्तव्य को अधिकार से।
- ओमप्रकाश तिवारी

Friday, September 6, 2013

परजा झेले आपद्काल

राजा की थैली में माल,
परजा झेले आपद्काल ।

चले काफिलों में सरकार,
जनता को पेट्रोल मुहाल ।

जूते बनते हैं राजा के,
खींच-खींच परजा की खाल ।

काट-काट मेरी ही जेब,
परस रहे हमको ही थाल ।

मुर्ग मुसल्लम खाएं वो,
मेरी थाली पतली दाल ।

करें भरोसा किस पर आज,
बैठे हैं उल्लू हर डाल । 

Sunday, August 25, 2013

कटवा कर नाखून

कटवा कर नाखून शहीदों में लिखवाने नाम चले,
मरने की जब बात चली तो करके मियाँ सलाम चले ।

बड़ी फिक्र है राजा जी को अपने मुल्क रिआया की,
खूब बहे आँसू घड़ियाली फिर घर जाकर जाम चले ।

जिनकी शान बढ़ाने ख़ातिर अपनी जान लड़ा बैठे,
गले लगाने के बजाय वो दे करके ईनाम चले ।

हमने उम्र बिता दी मंजिल तक सबको पहुँचाने में,
मेरी मैयत छोड़ सभी जन अपने-अपने काम चले ।

एक तरफ से संबंधों की ताली रहे बजाते हम,
उनकी बारी आई तो वह देकर पूर्ण विराम चले ।

(20 अगस्त, 2013) 

Sunday, May 19, 2013

खेल

खेल हैं या खेल के व्यापार हैं,
खेल में भी जेल के अब द्वार हैं।

थे भले अपने कबड्डी और लट्टू,
खेल अब तो जुए का बाजार हैं।

मत करो उम्मीद पकड़े जाएंगे,
चोर की रक्षा में पहरेदार हैं ।

बँट रही सबको बराबर रेवड़ी,
इनके आका भी बड़े खुंख्वार हैं।

खेलते कुछ लोग हैं मैदान पर,
कर रहे सौदा जो रिश्तेदार हैं।

धूर्त को हीरो बनाने के लिए,
आप और हम भी तो जिम्मेदार हैं।

(19 मई, 2013)

Tuesday, January 22, 2013

जन गण मन की बात न कर

जन गण मन की बात न कर
तू बस अपनी जेबें भर

तेरी ख़ातिर देश पड़ा
चारागाह समझकर चर

अपना था तू कल तक तो
आज निकल आए हैं पर

हमको भूखा रहने दे
ब्रेड के संग तू चाट बटर

याद आती अंग्रेजों की
वह भी थे तुझसे बेहतर

जनप्रतिनिधि कहलाए तू
तुझसे जन काँपें थर - थर

आज बन गया राजा तू
घूम रहा था कल दर - दर

दवा न तेरे काटे की
शरमाएं तुझसे विषधर

जनता बदल रही तेवर
मौका है तू जल्द सुधर

नीचे तेरी चलती है
ऊपर वाले से तो डर

( 22 जनवरी, 2013) 

रंग रंग के साँप

रंग रंग के साँप हमारी दिल्ली में,
क्या कर लेंगे आप हमारी दिल्ली में । 

हाफ शर्ट में घूम रहे हैं मुंबइया,
लोग रहे हैं काँप हमारी दिल्ली में ।

घोटालों की फाइल गायब कर करके,
खूब रहे हैं ताप हमारी दिल्ली में ।

मुल्क दरिद्दर बना हुआ है बना रहे,
चंद रहे हैं छाप हमारी दिल्ली में ।

दिल छोटे व नाक बड़ी उस्तादों की,
नाप सके तो नाप हमारी दिल्ली में ।

जब से गाँधी बाबा दुनिया छोड़ गए,
सच कहना है पाप हमारी दिल्ली में ।

(22 जनवरी, 2013)


घटना वास्तव में जनवरी, 2012 की है। वीटी से रात 10.15 बजे ट्रेन में बैठा ही था कि दिल्ली से वाट्सअप पर भाई विष्णु त्रिपाठी जी का एक मैसेज मिला । लिखा था - रंग रंग के साँप हमारी दिल्ली में, क्या कर लेंगे आप हमारी दिल्ली में । मैंने इसका जवाब भी तुरंत दे दिया - हाफ शर्ट में घूम रहे हैं मुंबइया, लोग रहे हैं काँप हमारी दिल्ली में। जवाब देने के बाद मुझे लगा कि ये पंक्तियां आगे बढ़ सकती हैं। देखते ही देखते दादर तक मेरी ग़ज़ल पूरी हो चुकी थी। 

Thursday, January 10, 2013

तुम बहाओ खून

रात के एक बज रहे हैं। मेंढर में शहीद हुए दोनों जवानों के रोते परिवारों ने आँखों से नींद उड़ा दी है। अपनी भावनाएं व्यक्त करने के सिवा मैं और क्या कर सकता हूं भला ? आप भी हमारी भावनाओं के सहयात्री बनें - 

तुम बहाओ खून हम आँसू बहाएंगे जवां
दोस्ती का हाथ दुश्मन से मिलाएंगे जवां

रो रहे माता पिता विधवा तो रोने दो उन्हें
चार दिन की बात है फिर भूल जाएंगे जवां

हैं जरूरी क्रिकेट के रिश्ते भी सरहद पार से
हम विकेट के रूप में गिन-गिन गंवाएंगे जवां

कारगिल मेंढर सियाचिन में जमो तुम बर्फ में
पॉलिसी हम रूम हीटर में बनाएंगे जवां

वाकई तेरी शहादत भी बड़ी अनमोल है
इस बहाने हम कफन भी बेच खाएंगे जवां

(१० जनवरी, २०१३) 


Saturday, December 29, 2012

दामिनी

कौन कह रहा मरी दामिनी
गली-गली में खड़ी दामिनी

खाकी-खादी के चक्कर में
हर पल-हर दिन पड़ी दामिनी

मूक-बधिर बेशर्म व्यवस्था
देख शर्म से गड़ी दामिनी

क्या अब भी कुछ सुधर सकेगा
प्रश्न बनी यह खड़ी दामिनी

अगर न फिर से सो जाएं हम
एक क्रांति की कड़ी दामिनी


(29 दिसंबर, 2012 - तेरह दिन के संघर्ष के बाद सिंगापुर में उस लड़की का निधन हो गया, जिसके साथ 16 दिसंबर को दिल्ली में दुराचार हुआ था । अफसोस के साथ उपजी पंक्तियों ने लिया ग़ज़ल का रूप)

Wednesday, December 26, 2012

न रात जाए

सरकती यूँ ही न रात जाए
न रात जाए न साथ जाए

जुबाँ पे तेरी मचल रही है
न रह अधूरी वो बात जाए

चमकती आँखों की रोशनी पर
फ़िदा हो बारावफ़ात जाए

क्युँ फ़िक्र करते हैं दुनिया भर की
न इश्क करने से जात जाए

है रिस्क का खेल ये मोहब्बत
फ़तह मिले या बिसात जाए

(26 दिसंबर, 2012)



झुर्रियां

सफेदी बाल पर गाल पर झुर्रियां
खिल रहीं सूरते हाल पर झुर्रियां

इक तिजोरी तजुर्बों की समझो इन्हें
ब्याज हैं मूल के माल पर झुर्रियां

जिंदगी के जुलम सब बयां कर रहीं
हैं इबारत सी दीवाल पर झुर्रियां

नाती-पोतों के संग खिलखिलाती हुई
नाचती उनकी हर ताल पर झुर्रियां

दीजिए प्यार सत्कार इनको सदा
लुटा देंगी दुआ थाल भर झुर्रियां

काटते हम वही जो हैं बोते कभी
रख रही हैं नज़र काल पर झुर्रियां

(26 दिसंबर, 2012)

Wednesday, November 7, 2012

रोशनी नीलाम होगी

जैसे-जैसे शाम होगी,
रोशनी नीलाम होगी ।

बोलियाँ फर्जी लगाकर,
कौड़ियों के दाम होगी ।

आपकी मेहनतकशी अब,
अर्थ बिन नाकाम होगी ।

नेकिनियती भी हमारी,
बेवजह बदनाम होगी ।

ख़ुदकुशी ज़िंदादिलों की,
सोचकर अंजाम होगी ।





( 6 नवंबर, 2012)

Wednesday, May 16, 2012

गुंजाइश रहे



दोस्त ! जमकर हो बहस और जोर-अजमाइश रहे,
किंतु वाले - कुम सलामी की भी गुंजाइश रहे ।

एक मानी दो भी मानी चार मानी आपकी,
कब तलक माना करें गर रोज फरमाइश रहे ।

फ़र्क उन्नीस-बीस का हो तो फ़रक पड़ता नहीं,
किस तरह रिश्ते चलें जब सात-सत्ताइस रहे ।

न मिले तो कोई शिकवा न करो भगवान से,
जब मिले इतनी पियो फिर न कभी ख्वाहिश रहे ।

गुल के संग हों खार जो दो-चार तो चल जाएंगे,
बाग क्या करना जहां खारों की पैदाइश रहे ।

- ओमप्रकाश तिवारी 




Sunday, October 17, 2010

मुंह ना खोलो

चिस्ती साहब मुंह ना खोलो,
मुंह खोलो तो सच ना बोलो ।

किसको प्यारा भाईचारा,
राजनीति की गिरह न खोलो ।

तोल रहे हैं सब जन जिनकी,
तोल सको तो तुम भी तोलो ।

गिर जाते हैं अकड़ू पौधे,
चलो हवा के संग-संग डोलो ।

डायबिटिक होती है शक्कर,
नीम करेले का रस घोलो ।

आप पिटे तो चुप हैं सारे,
बोलो भाई कुछ तो बोलो ।
- ओमप्रकाश तिवारी

Saturday, October 9, 2010

अब आप अपनी कीजिए

पंच अपनी कर गए अब आप अपनी कीजिए,
लीजिए हिंदोस्तां और एक तिहाई दीजिए ।

पांच गांवों के लिए थे लड़ मरे इतिहास है,
कुछ नया रचते हैं अब दोहराव तो ना कीजिए ।

है मिला सम्मान दुनिया में उसे जिसने दिया,
वक्त है देने की ख़ातिर हाथ ऊपर कीजिए ।

दूध में मधु हो जरा तो जायका बढ़ जाएगा,
टाटरी के स्वाद से परहेज थोड़ा कीजिए ।

आपके मज़हब को ज्यादा आपसे हैं जानते,
उन सियासत दां से तौबा सिर्फ तौबा कीजिए ।

Friday, October 1, 2010

अब तो है आप पर---

अब तो है आप पर कि हाथ मिलाकर चलिए,
या जमींदोज़ हैं जो उनको जिलाकर चलिए ।

लोग बैठे हैं सियासत की बिसातें लेकर,
सुर में सुर आप न अब उनके मिलाकर चलिए ।

साथ रहना है हमें मुल्क है हम दोनों का,
एक परिवार में क्यूं शिकवा-गिला कर चलिए ।

याद रखने को बहुत सारी हसीं यादें हैं,
बुरे जो ख्वाब थे अब उनको भुलाकर चलिए ।

गुजर गया है जमाना न साथ बैठे हैं,
पीजिए हमसे भी और खुद भी पिलाकर चलिए ।
- ओमप्रकाश तिवारी